शनिवार, 10 मई 2014
शुक्रवार, 17 फ़रवरी 2012
मेरे मन
मेरे मन ,
मंगलवार, 14 फ़रवरी 2012
ये फागुनी होली
आज बसंत बहार की होली
ये फागुनी होली ।
मस्ती ओ उल्लास की होली
देवर और भाभी की होली
ये फागुनी होली |
चंग और ढोल की थाप पर
मंजीरे लेकर
फाग गाते लोगों की होली
भंग की तरंग में डूबी
राजस्थान की होली
प्यार के रंग बिखेरती ये हुडदंगी होली
ये फागुनी होली ।
मोहिनी चोरड़िया
सोमवार, 6 फ़रवरी 2012
मालिनी बसंत
तन-मन की तरुणाई लाई
मालिनी बसंत आई|
फूलों का उपहार
गंधों का त्यौहार
भौंरों का अभिसार लाई
मालिनी बसंत आई |
मदमाता मधुमास
फूलता पलाश
पवन पगलाती लाई
मालिनी बसंत आई |
रसभरी अमराई
कीटों का गुँजार
कलियों में सिहरन लाई
मालिनी बसंत आई |
मन में उमंग
तन में उल्लास
आँखों में लाज लाई
मालिनी बसंत आई |
नेह की पिचकारी
केसर,चंदन ,टेसू के
रंगों का अम्बार लाई
मालिनी बसंत आई |
कविताओं का कुंकुम
गीतों का अबीर
गज़लों का गुलाल लाई
मालिनी बसंत आई |
रसिया और फाग लाई
केसरिया मजाक लाई
तन-मन की तरुणाई लेकर
मालिनी बसंत आई |
मोहिनी चोरड़िया
गुरुवार, 2 फ़रवरी 2012
बसंत महीने में
बनन में बागन में
बगरयो बसंत है |
फागुनी उमंग है ||
फूटी अमराइयों में
बासंती सुगंध है |
गुनगुन गुंजाता
आम्रकुंजों में अनंग है ||
चम्पा और चमेली ने
गाँवों ढाणियों की डगर
फूलों का लिबास है |
पर्वतों मैदानों में
सेमल अमलतास है ||
बसंत महीने में
मोहिनी चोरडिया
मंगलवार, 29 नवंबर 2011
मेरी माँ
कहने लगी, सुना है
तूने कविताएँ बनाईं ?
मुझे भी सुना वो कविताएँ
जो तूने सबको सुनाई
मैं अचकचाई
माँ की कहानी माँ को ही सुनाऊँ !
माँ तो राजा- रानी की कहानी
सुनाती थी
उसे एक आम औरत की कहानी
माँ इंतजार करती रही
जैसा जीवन में करती थी,
कभी खाना खाने के लिए
तो कभी देर से घर आने पर
घबराई सी देहरी पर बैठी
पिताजी की डांट से बचाने के लिए |
आँखें नम हुईं
आवाज भर्राई
अपने को नियंत्रित कर
उससे आँखें मिलाये बगैर
उसे कविता सुनाई |
एक औरत थी
औसत कद , सुंदर चेहरा
सुघड़ देह
बड़ी- बड़ी आँखें
घूँघट से बाहर झाँकतीं
सुबह घर को, दोपहर बच्चों को
रात पति को देती
हमेशा व्यस्त रहती
पति की प्रताड़ना सहती ,
बच्चों को बड़ा करती
घर आये मेहमानों का स्वागत करती ,
सत्कार करती
फिर भी कभी न थकती
पति और बच्चों की खातिर
जिसकी रात भी दिन ही रहती
सुघड हाथों से घडी गई रोटियां क्या,
रसोई घर की बढ़ाते शान .
जो कम रुपयों में भी घर चला लेती
मुफ़लिसी में भी
सभी रिश्ते निभा लेती .
शरीर की शान, आभूषण, रहित रहती
लज्जा को अपना आभूषण कहती
बुरे वक्त में
घर की इज्जत बचाती
शरीर से छोटी वो
अपने कद को हमेशा उँचा रखती ,
बस देना ही जो अपना धर्म मानती
पति की सेवा ,बच्चों की परवरिश में
पूरा जीवन निकाल
एक दिन हो गई निढाल
जीवन की अंतिम सांस
बेटी की गोदी में निकाल
विदा कह गई इस जीवन को
शायद यह कहती -कहती
अगले जनम मोहे बिटिया न कीजो ,
मैंने माँ की और देखा,
माँ का चेहरा सपाट था
बिना उन हाव-भावों के जो राजा -रानी की कहानी
सुनाते वक्त उसके चेहरे पर होते थे ,
..वो धीमे से मुस्कुराई ,फिर कहा ..
सच ही लिखा है,
औरत की तकदीर जन्मों से यही है
फिर भी एक कविता ऐसी लिख
जिसमें एक राजा हो एक रानी हो
दोनों की सुखद कहानी हो .
सपने तो अच्छे ही बुननें चाहियें
शायद कभी सच हो जाएँ !
वो वापस चली गई यह कहकर
फिर आउंगी ,लिख कर रखना राजा- रानी की कहानी
कभी तो सच होगी ?
जो मेनें अपनी बेटियों के लिए बुनी थी |
मोहिनी चोरडिया
रविवार, 27 नवंबर 2011
कितना अच्छा लगता है ?
मंगलवार, 11 अक्टूबर 2011
दीपावली
श्री रामचंद्र जी के अयोध्या लौटने पर उनके स्वागत में एक नवगीत -
हेली मंगल गाओ आज ,
सहेली मंगल गाओ आज |
ढोल नगाड़ा नौपत बाजे
अयोध्या में आज
तोरण द्वार सजे सब आँगन
कौशल्या घर आज |
मोत्यां चौक पुरावो है सखी
झिलमिल आरती थाल
रामचंद्र जी लौटेंगे सखी
सीता लखन संग आज |
शुभ घड़ी आई भ्राता मिलाई
दशरथ के घर आज
भरत की तपस्या लायेगी
सखी ! खुशियों के रंग आज |
उर्मिला की होगी साधना
पूरी है सखी आज
कैकेयी ,सुमित्रा के मन पुलकित ,
पूरे हुए सब काज |
अमावस की रात सजेगी
अयोध्या नगरी आज
घी के दीपों की जगमग होगी
उत्सव मनेगा आज |
मोहिनी चोरडिया
सोमवार, 10 अक्टूबर 2011
जो गुज़रे थे कभी तुम्हारे साथ
बुधवार, 5 अक्टूबर 2011
हाइकू कवितायेँ
एक बूँद उड़ी
सागर से
कब लौटेगी निज घर ?
दूर गगन
टूटे पंख
जीवित संकल्प |
अमृत की बूँदें
जीवन से दूर
हम विषपायी जनम के|
नीम की निम्बोली
सर उचका कर बोली
मिश्री से मेरी अनबोली |
गाँव की चौपाल
निर्विकार निर्विचार से बैठे लोग
अनासक्त योगी |
यमुना का कूल
नीवं का पत्थर
ताज महान |
गुलाब के साथ कांटे
खूबसूरती का
सुरक्षा कवच |
मोहिनी चोरडिया