सोमवार, 10 अक्टूबर 2011

जो गुज़रे थे कभी तुम्हारे साथ


बीत गये जीवन की किताब के,
पन्ने फड़फड़ाये
उन में दबे सूखे गुलाबों ने
स्मृतियों पर पड़ी धूल के आवरण हटाये ।


एक भीनी सी खुशबु ने उमग कर
भर दिया नासापुटों को
फिर, बिखर गई, चारों ओर मेरे,
मन बहकने को हुआ आतुर,
तन सिहर गया ।


खूबसूरत पल गुज़रने लगे
आँखों के सामने से,लगे चटकने
दीपावली के पटाखों की लड़ियों से
फुलझड़ियों की सी सतंरगी आभा बिखेरते
चकरी से घूम गये मन में ।


एक मीठी सी मुस्कान ने,
चेहरे को नई रंगत दी
इक ज़माने के बाद खिल उठा मन,
पुलक गया तन
खिले–खिले अनार सा ।


बरसों बाद आईना
देखने का मन हुआ
आँखें मूँद ,फिर से जिया मैंने,
उन पलों को
जो गुज़रे थे कभी तुम्हारे साथ ।


मोहिनी चोरडिया
चेन्नई

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