मुसलमान क़त्ल करें
हिंदू जिबह करें
दोनों की करुणा
एवं मानवता मन की
मर चुकी है
आक्षेपों का दौर
शुरु होता है
लेकिन तुम्हारी इस आग
का शिकार तो
बार-बार वही ‘बलि का बकरा’
बनता है, जो सदियों से बन रहा है
उसको कुछ फर्क नहीं पड़ता
हिन्दू मारें
या मुसलमान काटें
उसे तो, जीवन से, हाथ
धोना ही है
दोनों की दीवानगी आत्मा को
या कहें परमात्मा को काटती है
अल्लाह को मिटाती है
गीता पढ़ें या
पढ़ें कुरान
न जज़्बात बदले
न जीवन की समझ आयी
सिर्फ साम्प्रदायिकता फैलायी
धर्म को बदनाम किया
मज़हब को नापाक किया
अब भी समय है,
कहते हैं, " जब जागें तभी सवेरा "
बाज़ आयें गुनाहों से
कोशिश ही नहीं संकल्प करें
आने वाली पीढ़ी के लिए
छोडें एक दुनिया ऐसी
जहां सिर्फ मानवता पनप रही हो
न हो तेरा, न हो मेरा
न हो हिन्दू न हो मुसलमान
सब हों समान ।
मोहिनी चोरडिया
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