गुरुवार, 22 सितंबर 2011

जो गुज़रे थे कभी तुम्हारे साथ


बीत गये जीवन की किताब के,
पन्ने फड़फड़ाये
उन में दबे सूखे गुलाबों ने
स्मृतियों पर पड़ी धूल के आवरण हटाये ।

एक भीनी सी खुशबु ने उमग कर
भर दिया नासापुटों को
फिर, बिखर गई, चारों और मेरे,
मन बहकने को हुआ आतुर,
तन सिहर गया ।

खूबसूरत पल गुज़रने लगे
आँखों के सामने से
लगे चटकने, दीपावली के पटाखों
की लड़ियों से
फुलझड़ियों की सी सतंरगी आभा बिखेरते
चकरी से घूम गये मन में ।

एक मीठी सी मुस्कान, जैसे दीपावली की मिठाई
ने, चेहरे को नई रंगत दी
इक ज़माने के बाद खिल उठा मन,
पुलक गया तन
दीपावली के अनार सा ।

बरसों बाद आईना
देखने का मन हुआ
आँखें मूँद फिर से जिया मैंने,
उन पलों को
जो गुज़रे थे कभी तुम्हारे साथ ।

मोहिनी चोरडिया

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