गुरुवार, 22 सितंबर 2011

जो गुज़रे थे कभी तुम्हारे साथ


बीत गये जीवन की किताब के,
पन्ने फड़फड़ाये
उन में दबे सूखे गुलाबों ने
स्मृतियों पर पड़ी धूल के आवरण हटाये ।

एक भीनी सी खुशबु ने उमग कर
भर दिया नासापुटों को
फिर, बिखर गई, चारों और मेरे,
मन बहकने को हुआ आतुर,
तन सिहर गया ।

खूबसूरत पल गुज़रने लगे
आँखों के सामने से
लगे चटकने, दीपावली के पटाखों
की लड़ियों से
फुलझड़ियों की सी सतंरगी आभा बिखेरते
चकरी से घूम गये मन में ।

एक मीठी सी मुस्कान, जैसे दीपावली की मिठाई
ने, चेहरे को नई रंगत दी
इक ज़माने के बाद खिल उठा मन,
पुलक गया तन
दीपावली के अनार सा ।

बरसों बाद आईना
देखने का मन हुआ
आँखें मूँद फिर से जिया मैंने,
उन पलों को
जो गुज़रे थे कभी तुम्हारे साथ ।

मोहिनी चोरडिया

प्रकृति के संग


चलो, प्रकृति के संग हो लें
नदी झरनों के संग डोलें,
तितलियों के संग बोलें
मूक पशुओं की आँखों को तोलें
चलो, प्रकृति के संग हो लें ।

पेड़-पौधों की संवेदनाओं को अंक में भर लें
धरती की सहनशीलता को उर में लें
हमारी करुणा की धारा का जल,
इन सबको आप्लावित करे
ऐसा कोई संकल्प मन में संजों लें।
चलो, प्रकृति के संग हो लें ।

गुलाबों से रिश्ता जोड़ें,
काँटों भरे पथ को भी सह लें
गांवों की और जाती पगडंडियों पर खेलते
धूल धूसरित बच्चों से नाता जोडें
चलो, प्रकृति के संग हो लें
|
इन्द्रधनुष से आकर्षक रंगों को फैलायें,
आवारा बादलों से छन कर आते प्रकाश में नहायें,
खड़ी फसल की कच्ची बालियों को सहलायें
मिट्टी के, लिपे पुते घरों के
आंगन की खटिया पर, कुछ देर सो लें,
चलो, प्रकृति के संग होलें ।

मोहिनी चोरडिया

बुधवार, 21 सितंबर 2011

खनक

हाँ मैं तुझे भुला

न पाऊंगा

जब भी कोई खनकती आवाज़

सुनाई देगी

तुझे आसपास पाऊँगा ।

उदास चेहरे पर

बड़ी बड़ी हिरणी जैसी आँखे

जब भी देखूंगा

और उनकी चमक, जब भी

अपने रंग बिखेरेगी

तुझे आसपास पाऊँगा ।

शर्माती लजाती अदाओं से

दिल को धड़काता

बाहों में समाने को आतुर, कोई साया,

ऐसा समां जब भी बनेगा

तुझे आसपास पाऊँगा ।

किसी चौदहवीं की रात

चाँद जब झांकेगा खिड़की से

और बाहें मेरी होंगीं आतुर

चांदनी सा बदन समेटने को

तुझे आसपास पाऊँगा |

आसमां में दिखेगा इन्द्रधनुष

फिजां में तैर रही होगी खुशबु

तुझे आसपास पाऊंगा

हाँ! मैं तुझे भुला न पाऊँगा ।


मोहिनी चोरडिया